भारतीय रिजर्व बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है की लोन मोरटोरियम की अवधि को 6 महीने से आगे ना बढ़ाया जाए साथ ही आरबीआई ने उच्चतम न्यायालय से मांग की है की लोन न चुकाने वालों के खातों को एनपीए घोषित करने पर रोक लगाने वाले अंतरिम आदेश को तत्काल वापस ले लिया जाए।
विदित हो कि उच्चतम न्यायालय लोन मोरेटोरियम की अवधि को बढ़ाने तथा इस दौरान बैंकों के लोन पर लगे ब्याज को माफ करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 3 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी कर ऐसे सभी लोन खातों को एनपीए घोषित करने पर रोक लगा दी थी जो 31 अगस्त 2020 तक एनपीए नही हुए थे।
कोरोना के कारण मार्च में लागू किये गए देशव्यापी लॉक डाउन के दौरान आरबीआई ने कर्ज़धारकों को 3 महीने के लिए लोन की किश्त जमा करने से छूट देते हुए मोरेटोरियम घोषित किया था। बाद में इसको तीन महीनों के लिए और बढ़ाते हुए 31 अगस्त तक के लिए कर दिया गया था। इस दौरान भी सभी प्रकार के कर्ज़ों पर ब्याज और उस पर अतिरिक्त ब्याज़ लगाया जाना था।
हालांकि कोर्ट ने मोरेटोरियम के दौरान लगाए गए ब्याज़ पर गहरी नाराजगी जाहिर की थी। इसके फलस्वरूप कुछ दिन पूर्व वित्त मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि सरकार ने मोरेटोरियम अवधि के ब्याज़ पर लगाये गए अतिरिक्त ब्याज़ को माफ करने का निर्णय लिया है। सरकार के निर्णय के अनुसार ये छूट 2 करोड़ रुपए तक के एमएसएमई व निजी लोन धारकों को ही दी जाएगी।
अब आरबीआई ने कोर्ट से कहा है कि लोन मोरेटोरियम की अवधि को 6 महीनों से आगे न बढ़ाया जाए। बैंक ने कहा है कि यदि मोरेटोरियम की अवधि बढ़ी तो इससे लोन अनुशासन चरमरा जाएगा। साथ ही इसका छोटे कर्ज़धारकों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। नियामक बैंक ने कोर्ट से ये भी मांग की है कि वो पूर्व में जारी अपने अंतरिम आदेश को अविलंब वापस ले जिसमे न्यायालय ने कहा था कि जिन कर्ज़धारकों के लोन खाते 31 अगस्त 2020 तक एनपीए घोषित नही हुए हैं उनको अगले आदेश तक एनपीए घोषित न किया जाए। रिज़र्व बैंक ने कहा कि यदि कोर्ट ने लोन न चुकाने वालों के खाते एनपीए करने की छूट न दी तो इसका पूरे बैंकिंग सिस्टम पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

