कांग्रेस: क्या प्रदेश अध्यक्ष पद पर होगी दलित नेता की ताजपोशी!

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड कांग्रेस में खेमे बंदी तेज हो गई है। जहां एक और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का गुट संगठन पर अपने वर्चस्व को कायम रखने पर आमदा है, वही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थक भी अब खुलकर मैदान में कूद गए हैं। दरअसल पिछले कुछ समय से राज्य कांग्रेस में दोनों धड़ों के बीच बयानों का दौर जारी है। कांग्रेस के नेता विपक्षी भाजपा के बजाए सियासी तीर अपने ही दल के दूसरे नेताओं पर दाग रहे हैं।
ये हाल तब है जब प्रदेश के नव नियुक्त प्रभारी देवेंद्र यादव विगत माह पहली बार राज्य के दौरे पर आए थे और उन्होंने नेताओं से गुटबाजी समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन पार्टी की अंदरूनी लड़ाई से उनकी बात के हवा में उड़ने के संकेत मिल रहे हैं। हालात ये हैं कि पिछले दिनों रावत कैम्प के कुछ विधायकों ने राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा के नेतृत्व में प्रेस वार्ता कर प्रीतम सिंह के लिए खुली चुनौती पेश कर दी। हरीश रावत समर्थकों का कहना है कि 2022 का विधान सभा चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाना चाहिए।
उधर दिल्ली दरबार पार्टी की राज्य इकाई में बड़े परिवर्तन के पक्ष में दिखाई दे रहा है। समाचार एजेंसी आईएएनएस ने एक बड़े नेता के हवाले से दावा किया है कि आलाकमान राज्य में संगठन का नेतृत्व किसी दलित चेहरे को सौंपने पर मंथन कर रहा है। इसके पीछे दलित वोटों को लुभाने की रणनीति बताई जा रही है। पार्टी का मानना है कि राज्य में 18 विधान सभा सीटें ऐसी हैं जहां 5 से 10 हज़ार की संख्या में दलित वोटर हैं, जो पार्टी की जीत में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इस नाते नए प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा पार्टी की पहली पसंद बताये जा रहे हैं। टम्टा को हरीश रावत का करीबी माना जाता है। पार्टी सूत्रों की माने तो रावत कैम्प चुनाव से पहले अपने खेमे का अध्यक्ष बनवाना चाहता है। जिससे चुनावों में टिकट वितरण अपने हिसाब से कराया जा सके।
लेकिन कहानी इतनी भर नहीं है, इसमें एक ट्विस्ट है। सन 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा इन्ही प्रदीप टम्टा को दलित चेहरे के तौर पर राज्य सभा भेजा गया था। तब भी यही तर्क रखा गया कि 2017 के चुनाव से पहले इस निर्णय से राज्य के दलित वर्ग में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। इसके लिए राज्य सभा की दहलीज पर खड़े तब के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय का रास्ता रोका गया। हालांकि विधान सभा चुनाव परिणामों में उपाध्याय को रोककर टम्टा को राज्य सभा भेजने का कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिला। बल्कि पार्टी की बुरी हार ने रावत की रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए थे।
अब 5 साल बाद भी कांग्रेस में हरीश खेमे द्वारा वही तर्क दिया जा रहा है। हालांकि पार्टी सूत्रों ने इस बात की पुष्टि नहीं की है। लेकिन सियासी जबानी जंग ने राज्य कांग्रेस को कई खेमों में बांट दिया है। जानकारों की माने तो चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर की इस खेमे बाज़ी का कांग्रेस को खामियाजा उठाना पड़ सकता है। अब देखना ये है कि पार्टी नेतृत्व नेताओं व धड़ों में सामंजस्य बैठाता है या भाजपा के बजाए कांग्रेस नेता आपस मे जोर आजमाइश करते रहेंगे।

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