आज पूरे देश में बसंत पंचमी पर्व की धूम है। अगर बात करें पौराणिक कथाओं की तो जब सृष्टि की सरंचना हुई तब पेड़-पौधे पशु- पक्षी नदियां पहाड़ सबकुछ थे। लेकिन फिर भी सब कुछ सूना सा था। मूक थी, तब सृजनकर्ता ब्रह्मा ने अपने अपने कमंडल से जल निकाल कर छिड़का और एक सुंदर देवी का प्रकाट्या हुआ। ये देवी माँ स्वयं सरस्वती माँ थीं, तभी से पूरी सृष्टि में स्वरमय हो गई, तब से आज तक ये वो दिन वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है।
माँ सरस्वती की पूजा करने वालो के लिए सरस्वती और वसंत पंचमी दोनो का ही एक अलग स्थान हैं आज के दिन सभी माँ सरस्वती की पूजा अर्चना बड़े ही भावना और सुख के साथ करते हैं। ये दिन माँ की आराधना का दिन माना जाता है। उस दिन लोग पीले वस्त्र पहन कर देवी की आराधना करते हैं। पीला रंग गेहूं की पकी हुई बालियों और सरसों के फूल का प्रतीक भी होता है यानी की वसंत पंचमी वसंत के आगमन के साथ ही फसलों के पकने की भी शुरुआत होती है।आज के दिन कई श्रद्धालु गंगा का स्नान भी करते हैं। इलाहाबाद के संगम तट पर इस दिन श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है। हिमाचल प्रदेश में श्रद्धालु तत्पनी में एकत्र होते हैं और गर्म पानी के झरनों में स्नान करते हैं वहीं बंगाल प्रांत में ढाक की थाप के बीच देवी की आराधना होती है।
माँ सरस्वती के रूप का वर्णन-
देवी सरस्वती के एक हाथ में पुस्तक दूसरे में वीणा तीसरे में माला होती है वहीं चौथा हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में होता है। छात्रों और कलाकारों के लिए देवी सरस्वती का विशेष स्थान होता है। इसलिए कई विद्यालयों में वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है।

