अफगानिस्तान में फसे उत्तराखंड निवासी पहुंचे अपने घर,सुनाई दिल दहलाने वाली कहानी

देहरादून : अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद कई भारतियों को सेना के विमान द्वारा रेस्क्यू किया गया है आज शनिवार को भी करीब 85 इंडियंस को वतन पहुँचाया गया है। अपने शहर आकर लोगों ने वह के खौफनाक मंजर की दास्तान सुनाई है। इसी कड़ी में उत्तराखंड के कई नागरिक भी अपने घर लौट आए हैं लेकिन ,उनका कहना है कि उस समय उनके मन में केवल जान बचाने की चिंता थी। क्योंकि, वहां हालात बहुत गंभीर हो चुके हैं। अफगानिस्तान में उत्तराखंड के साथ ही देहरादून के कई पूर्व सैनिक नौकरी करते हैं, जो दूतावासों और कंपनियों की सुरक्षा में तैनात थे। इसमें से देहरादून के गल्जवाड़ी के साथ ही केहरी गांव प्रेमनगर के एक महिला समेत चार लोग सुरक्षित आए है। इन लोगों के दिलों और आंखों में वहां के हालातों का खौफनाक दृश्य साँझा किया है।  

जो भी उत्तराखंड लौटे है इनमें से अधिक लोग वो है जो अपनी जान बचाने के लिए अपना सब कुछ यहां तक कि वीजा, कपड़े, पैसे और अन्य डॉक्यूमेंट वहीं छोड़ आए हैं। वह भगवान का शुक्र तो मना ही रहे हैं, साथ ही ब्रिटिश एंबेसी का भी आभार जता रहे हैं। और कह रहे हैं की ब्रिटिश एम्बेसी ने समय रहते उन्हें वहां से सुरक्षित निकाला। अभी भी वहां फंसे अपने साथियों को लेकर चिंतित हैं। वह उनकी सलामती के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। जोहड़ी गांव निवासी अजय कुमार थापा, दीपक कुमार, पूरन थापा और प्रेम कुमार अफगानिस्तान में ब्रिटिश एंबेसी में काम करते थे। उन्होंने बताया कि 14 अगस्त की शाम को ब्रिटिश एंबेसी ने तालिबानियों की सोच को समझ लिया था जिसके बाद उन्होंने सभी कर्मचारियों को टिकट पकड़ाकर वहां से निकलने की हिदायत दी।  निर्देश दिए थे कि सभी केवल एक ही बैग साथ लाएंगे। जिसमें उनके पासपोर्ट, वीजा और अन्य जरूरी दस्तावेज शामिल हों। कहा कि इसके बाद एंबेसी की ओर से तत्काल सभी कर्मचारियों को एयरपोर्ट पहुंचाया गया। वहां से पहले दुबई और फिर लंदन के बाद भारत भेजा गया। उन्होंने बताया कि जब वह वहां से निकले तो चारों तरफ गोलियां चल रही थीं। जिस बस में वह एयरपोर्ट पहुंचे उसे स्थानीय लोगों ने रोकने की कोशिश की, लेकिन सेना ने उन्हें वहां से सुरक्षित एयरपोर्ट तक पहुंचाया।इतना ही नहीं बल्कि अनारवाला, जोहड़ी, क्लेमेंटटाउन, ठाकुरपुर और गढ़ी के कई लोग अभी भी वहां फंसे हुए हैं। वह एयरपोर्ट से महज दो-तीन किलोमीटर दूर होटल में हैं, लेकिन उन्हें निकलने का मौका ही नहीं मिल रहा है।

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