स्वामी सानंद: आस्था के लिए बलिदान

-गुंजन मिश्रा

डॉ गुरुदास अग्रवाल या स्वामी सानंद, जो कानपुर आई आई टी में सिविलइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर, केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड, में मेंबरसेक्रेटरी, महात्मा गाँधी ग्रामोदय विश्विद्यालय में पर्यावरण विभाग स्थापितकरके अपनी सेवाएं देते रहे, की जयंती (जन्म दिन) २० जुलाई को है ।आपने गंगा को  अविरल निर्मल रखने के लिए अपना जीवन उन करोङोलोगो की आस्था जो गंगा जी के लिए है, के लिए बलिदान कर दिया।प्रोफेसर अग्रवाल की गंगा के लिए आस्था में सिर्फ धार्मिक पहलु हीशामिल नहीं था बल्कि उनकी जो मांगे भारत सरकार से गंगा के लिए थीया जो अभी भी भारत सरकार द्वारा नहीं पूरी की गयी है, उनसे स्पष्ट है किवो गंगा पर निर्भर प्रत्येक जीव जंतु, पेड़ पौधे, व् मानवीय जीवन के लिएएवं देश की सभ्यता व् संस्कृति जो गंगा के माध्यम से पूरे देश में बहती हैउसके लिए चिंतित एवं परेशान थे। वैज्ञानिक के रूप में वो अच्छीतरह सेगंगा के वैज्ञानिक गुणों से, इंजीनियर होने के नाते वो गंगा जी कीपर्यावरणीय वहन क्षमता, गंगा जी के बहाव के महत्व, व् गंगा जी को बांधोएवं बेराजो में कैद करने क्या नकारात्मक परिणाम होंगे, एवं सांसारिकजीवन छोड़ देने के बाद आम लोगो कि आस्थाओं से भी स्वामी सानंदअच्छी तरह परिचित थे। यही कारण था कि उन्होंने 5 अगस्त, 2018 कोपीएम मोदी को लिखे एक पत्र में निम्नलिखित इन चार मांगों को सूचीबद्धकिया था।

1. गंगा महासभा द्वारा 2012 में तैयार किए गए विधेयक का मसौदासरकार को तत्काल संसद में चर्चा के लिए लाना चाहिए और इसे पारितकराना चाहिए। यदि विधेयक पारित नहीं होता है, तो मसौदे के अध्याय 1 से अनुच्छेद 1 से 9 को राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा लागू किया जानाचाहिए।

2. सरकार को अलकनंदा, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर, मंदाकिनी औरगंगा नदियों पर सभी निर्माणाधीन और प्रस्तावित बिजली परियोजनाओंको रद्द करना चाहिए।

3. हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में वनों की कटाई, वध और सभी प्रकार की खननगतिविधियों को पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए।

4. केवल नदी के हित में कार्य करने की शपथ के तहत प्रधान मंत्री द्वारानामित 20 सदस्यों के साथ एक गंगा भक्त परिषद का अस्थायी रूप सेगठन किया जाना चाहिए।

स्वामी सानंद ने जो शोध कार्य आईआईटी कानपुर में किये उनके आधारपर उन्होंने गंगा की पवित्रता और चिकित्सीय गुणों में दृढ़ विश्वास बनाएरखा। इतना ही नहीं डॉ अग्रवाल को मालूम था की गंगा की अविरलता व्निर्मलता के बिना न तो सबका साथ, सबका विकास हो सकेगा और न हीसयुंक्त राष्ट्र के १७ सतत विकास कार्यक्रम पूरे किये जा सकते है ।क्योंकि गंगा की अविरलता और निर्मलता पर करोडो लोगो का जीवन व्रोज़ी रोटी के साथ देश की जैवविविधता भी आधारित है। इसजैवविविधता के माध्यम से ही प्रकृति के जो विभिन्न चक्र है वो पूरे होते है। इसलिए जब गंगा जी की जैवविविधता नष्ट होगी तो स्वभाभिक है किदेश कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक समरसता व् पारिस्थितिकी संतुलन आदिपर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

स्वामी सानंद ने 2008 में अपना पहला अनशन किया था, जिसके बाद2009 और 2010 में भैरों घाटी, लोहारी नागपाला और पाला मनेरी मेंजलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ उपवास किया गया था, और उनसभी को रोकने में सफल हुए । वास्तव में, लोहारी नागपाला में परियोजनालगभग पूरी हो गई थी जब पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने 2010 में इसेखत्म कर दिया था। उन्होंने सरकार से भागीरथी नदी के 125 किमी हिस्सेको पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने के लिए कहा। 2012 में जब उन्होंने चौथा अनशन किया तो उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल मेंभर्ती कराना पड़ा। 2013 में, उन्होंने अपने पांचवें उपवास के कारण 15 दिनजेल में बिताए। इसके बाबजूद भी गंगा जी का बन रही जल विदूयतपरियोजनाओं को न रोक सके।

डॉ अग्रवाल ने जिन पर्यावरणीय पहलुओं का हल निकाला जा सकताउनकी कीमत पर कभी भी नहीं चाहा कि विकास के लिए किये जा रहेकार्यो पर रोक लगे। यही कारण था कि उन्होंने ३ पत्र प्रधानमंत्री को लिखे२०१८ में पहला पत्र 24 फरवरी को और दूसरा 13 जून को भेजा गया था।तीसरा  5 अगस्त को लिखा गया था।पहले दो पत्रों में पीएम मोदी कोअपने “छोटे भाई” के रूप में संबोधित किया, जबकि तीसरे पत्र में, उन्होंनेउन्हें भारत के प्रधान मंत्री के रूप में संदर्भित किया। लेकिन इसके बाबजूदकोई जबाब नहीं मिला।  हा, उनके निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेट्विटर पर लिखा, “श्री जीडी अग्रवाल जी के निधन से दुखी हूं। सीखने, शिक्षा, पर्यावरण को बचाने, विशेषकर गंगा सफाई के प्रति उनके जुनूनको हमेशा याद रखा जाएगा। मेरी संवेदनाएं।”

हालाँकि स्वामी सानंद ने कभी भी प्रेस में गंगा जी का महत्व आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बताने कि कोशिश नहीं की ।  वोसिर्फ आस्था की बात करते थे। क्योंकि वो जानते थे कि आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं के हल भारत सरकार के पासहज़ारो पन्नो के मोटे मोटे ग्रंथो में तुरंत तैयार किये जा सकते है। लेकिनसच में व् धरातल पर क्या होता इसका अनुभव उनको केंद्रीय प्रदूषणनियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव के पद पर रहते हुए हो गया था।

स्वामी सानंद द्वारा गंगा जी के संरक्षण के लिए जिस आस्था शब्द काउपयोग सिर्फ धार्मिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नहीं किया था। आस्थासे उनका मतलब था कि अगर आप वैज्ञानिक है तो आप विज्ञानं, अर्थशास्त्री गंगा से होने वाले आर्थिक लाभ, समाजशास्त्री गंगा से समाजकी समरसता, जीव विज्ञानी व् वनस्पति शास्त्र के ज्ञाता अपने क्षेत्र केअनुसार अपनी रिसर्च के आकड़ो के आधार पर अपनी तर्कशक्ति काप्रयोग करते हुए गंगा के महत्व को सिद्ध कर सकते है। उदाहरण के लिएअगर आप हिन्दू धर्म के अनुसार गंगा को जानने की कोशिश करेंगे तो गंगाजी शिव जी की जटाओ से निकली है, भूविज्ञानी व् जलवेत्ता के हिसाब सेग्लेशियर से, चिकित्सक व् जीवविज्ञानी के रूप में गंगा जल मेंबैक्ट्रियोफेज पाए जाते है। गंगा से संबधित तमाम ऐसी जानकारिया व्रिसर्च है जिनके माध्यम से अपने अपने बिषय के विशेषज्ञ गंगा के महत्वको समर्थन दे सकते है। क्योंकि आस्था का मतलब ही विश्वास, सम्बन्धया समर्थन होता है। इसीलिए आस्था के चलते गंगा के गुणों से सीख लेतेहुए स्वामी सानंद ने अपना शरीर भी आम लोगो के लिए समर्पित करदिया।

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