ऋषि कपूर ने हिंदी सिनेमा को वो नयाव यादों का तोहफा दिया है जो कभी कम नहीं होंगी। ऋषि कपूर की उनकी फिल्मों का अपना एक अलग ही अंदाज़ है मनोरंजन है। उनकी मुस्कान के करोड़ों लोग दीवाने आज भी है। नई पीढ़ी के लोग उन्हें अभिनेता रणबीर कपूर के पिता के तौर पर जानते रहे और ऋषि कपूर से बरसों तक संवाद करते रहे हम जैसे लोगों के लिए ऋषि कपूर एक ऐसे कलाकार रहे जो अपने चाहने वालों से संवाद के लिए हर समय उपलब्ध रहते। रणबीर कपूर भले अपने पिता की आखिरी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ के अधिक से अधिक प्रचार के लिए अंग्रेजी न्यूज चैनलों से ही बात करते आए हैं। लेकिन ऋषि कपूर ने हमेशा रणबीर का नादानियों को माफ किया और जरूरत पड़ने पर उनकी तरफ से हिंदी मीडिया से अपने अंदाज़ में छमा भी मांगी है।
आपको बतादें कि ऋषि कपूर की आखिरी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ उनके चाहने वालों के सामने हैं। फिल्म देखते समय आपको ऋषि कपूर की पिछली फिल्मों ‘राजमा चावल’ और ‘दो दूनी चार’ की याद आती रहती है, लेकिन ये फिल्म ऋषि कपूर के कैमरे के सामने आखिरी अभिनय के लिए तो देखनी ही चाहिए, इसे देखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि फिल्म में अभिनेता परेश रावल ने जो ऊष्मा भरी है,यह फिल्म सिखाती और बताती है जिंदगी तीखी नहीं नमकीन होनी चाहिए।
फिल्म रिवियु –आपको बतादें कि इस ओटीटी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ को देखने पर लगता है कि ऐसी फिल्में अब सिनेमाघरों में रिलीज हो पाया करेंगी, लगता नहीं है। क्यूंकि अब ट्रेंड बदल गया है अब दर्शक अक्षय कुमार को भी ‘अतरंगी रे’ या ‘मिशन सिंड्रेला’ जैसी फिल्मों में देखने सिनेमाघर नहीं जाते हैं। वह कुछ अतरंगी सा देखना तो चाहता है लेकिन ऐसा जो बस नाम का ना हो। इस मामले में फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ की तकनीकी टीम का नजरिया शुरू से साफ है कि वह जिंदगी के स्वाद की फिल्म बना रहे हैं। शोशेबाजी इस फिल्म का डीएनए है ही नहीं। पीयूष का कैमरा जिंदगी की जिंदादिली के डीएनए को साधकर पूरी फिल्म में सफर करता है और कामयाब रहता है। बोधादित्य बनर्जी से ये उम्मीद जरूर रही कि वे इस फिल्म को ओटीटी पर देखने के लिए इसकी लंबाई कम रखते।

