गौरतलब है कि प्रदेश में सिद्धपीठ श्री सिद्धबली महोत्सव का तीन दिवसीय कार्यक्रम शुरू हुआ था जिसके आखिरी दिन समापन गढ़वाली जागर गाए गए। इस दौरान डौंर-थाली की थाप पर विभिन्न देवी-देवताओं के जागरों से सिद्धों का डांडा खूब सजा। श्रद्धालुओं ने सिद्धबाबा के जयकारे लगाए नाचे झूमे और खूब रंग जमाया। भैरों और नरसिंह देवता के पश्वा जलते अंगारों पर नाचे और अंगारों को चबाया भी। देवताओं का यह रूप देखकर लोगों ने उनपर गंगाजल छिड़ककर उन्हें शांत करते दिखे।
बीते दिन रविवार को सुबह दस बजे से एकादश कुंडीय यज्ञ परिसर में बाबा के जागर गाए गए। लैंसडौन के बिंतल गांव से पहुंचे जागरी शिवेंद्र कुकरेती के सानिध्य में हरीश भारद्वाज और सहायकों ने अपने डौंर-थाली की थाप शुरू कर भगवन गणेश के गायन गए। माता भगवती, नरसिंह देवता, भैरों देवता, गुरु गोरखनाथ और हनुमान के जागर गाए गए।
जैसे ही उन्होंने माता का जागर गाया तो महिलाओं पर माता आ गयीं और गोरखनाथ और हनुमान के जागरों में कई लोगों पर एक साथ देवता आ गए। भैरों और नरसिंह देवता के पश्वा जलते अंगारों पर नाचे और जलते अंगारों को चबाना शुरू कर दिया।

