आज पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है। हरिद्वार के गंगा घाटों पर लोगों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया है। सभी ने स्नान करके पितरों को याद किया गया है। श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों की आत्मशांति के लिए 16 दिनों तक नियम पूर्वक कार्य किया जाना अच्छा माना जाता है। आचार्य डॉ. सुशांत राज ने बताया है कि भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष शुरू हो जातें हैं। इन 15 दिनों अपने पितरों को दिल से याद कर उनके लिए पूआ अर्चन किया जाता है। पूर्वजों की शांति के लिए तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध कर्म आदि किए जाते हैं। वायु पुराण, मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण समेत अन्य शास्त्रों में भी श्राद्ध के महत्व के बारे में बताया गया है। पितरों की आत्म तृप्ति अच्छे से करने वालों को कभी पितृदोष नहीं होता। इस बार पितृपक्ष का समापन 6 अक्तूबर को होगा। पितृ पक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध, महाभरणी श्राद्ध और सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों को खुश करना चाहिए। पितृ दोष को सबसे गंभीर और घनिष्ठ दोष माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। श्राद्धों में उसी तिथि पर उनका तर्पण कर उन्हें सम्मान दिया जाता है। यदि किसी की मृत्यु प्रतिपदा को हुई है तो उसी तिथि के दिन श्रद्धा किया जाना चाहिए। यदि निधन का दिन नहीं मालूम हो तो पिता का श्राद्ध अष्टमी और मां का नवमी पर किया जाना चाहिए। अहम्सा जांरै ये है कि धु-सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर होता है। जिनके बारे कुछ मालूम नहीं, उनका श्राद्ध अंतिम दिन अमावस पर कर दिया जाता है।
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